नज़रियाः राहुल गांधी की चुनौती जितनी संघ को, उतनी ही कांग्रेस को

ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ की गई अपनी तुलना सख्त नागवार गुजरी है. इस्लाम या मुसलमान से जुड़ी किसी भी वस्तु या अवधारणा का जिक्र अपने साथ करने का ख्याल भी संघ और उनके समर्थकों के लिए अकल्पनीय है.
इसलिए फौरन संघ और भारतीय जनता पार्टी के नेताओं ने राहुल की भर्त्सना कहते हुए कहा कि राहुल चूँकि भारत को नहीं जानते, वो संघ को भी नहीं जान सकते.
राहुल गांधी की जो बात संघ को चुभ गई, वह कुछ यों थी: अरब में जो मुस्लिम ब्रदरहुड है, वही भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है. दोनों में समानता है, यह बताने के लिए राहुल गांधी ने तीन तथ्य रखे. दोनों पिछली सदी के तीसरे दशक में वजूद में आई, दोनों पर अपने देशों के राष्ट्रीय नेताओं की हत्या के बाद प्रतिबन्ध लगा और दोनों में ही औरतों का प्रवेश निषिद्ध है.
तुलना हमेशा सीमित होती है लेकिन वह इसलिए नहीं की जाती कि यह बताया जाए कि एक बिलकुल दूसरे की तरह है. दोनों का रुझान एक है या स्वभाव समान है, यह बताना ही तुलना का मकसद है.
मुस्लिम ब्रदरहुड नाम से ही साफ़ है कि वह मुसलमानों के भाईचारे की बुनियाद पर टिका है और उसे मजबूत करना उसका मकसद है. इसके साथ ही इस्लाम को वह समाज और राज्य के संगठन की बुनियाद मानता है.
यही बात कुछ संघ के बारे में कही जा सकती है. वह हिन्दुओं के बीच बंधुत्व बढ़ाने और उनका संगठन मजबूत करने के उद्देश्य से गठित और परिचालित है. "संगठन में शक्ति है", यह संघ का प्रिय मंत्र है लेकिन इसमें जो अनकहा है, वह यह कि संगठन हिंदुओं का होना है.
अटल बिहारी वाजपेयी ने भी कहा था कि संघ हिन्दुओं को एकजुट करने का काम करता है. उनके मुताबिक़, "संघ के समक्ष दो काम हैं. एक हिन्दुओं को संगठित करना. एक मजबूत हिंदू समाज का निर्माण, सुगठित और जाति तथा अन्य कृत्रिम विभेदों से परे." क्या जातिविहीन, आत्मसम्मान युक्त समाज के गठन पर किसी को ऐतराज होना चाहिए?
अपना काम संघ अनेक संगठनों के जाल के जरिए करता है जो समाज के अलग-अलग तबकों में शिक्षा और सेवा के नाम पर सक्रिय हैं. यही मुस्लिम ब्रदरहुड भी करता है, शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरे कई क्षेत्रों में वह अनेक रूपों में सक्रिय है. हमास के काम का तरीका भी यही है और पाकिस्तान में जमात उल दावा भी इसी तरह काम करता है.
सारे संगठन जो किसी एक विचारधारा से परिचालित हैं, वे रूसो के इस सिद्धांत को जानते हैं कि ताकत के मुकाबले अधिक कारगर तरीका है लोगों की भावनाओं को अनुकूलित करके वर्चस्व स्थापित करना. ऐसा करके ये संगठन अपना एक व्यापक जनाधार बनाते हैं. वह उनके लिए खड़ा हो जाता है. मसलन हमास के चरमपंथी तरीकों के कारण उस पर जब भी फंदा कसेगा, उसके सामजिक कार्यों से लाभान्वित जनता उसके पक्ष में खड़ी हो जाएगी.
ब्रदरहुड हालाँकि पैदा मिस्र में हुआ लेकिन चूँकि इस्लाम दूसरे देशों में भी है, उसके प्रति आकर्षण तुर्की, ट्यूनीशिया,फिलस्तीन, कुवैत, जॉर्डन, बहरीन जैसे देशों में भी है और उसकी तरह के राजनीतिक दल वहाँ भी हैं.
संघ का दूसरा दायित्व उनके मुताबिक़ मुख्य रूप से अन्य धर्मावलम्बियों को मुख्य धारा में समाहित करना है. यह उन्हें संस्कार देकर किया जाना है.
संघ मुसलमानों और ईसाईयों को कैसे संस्कार देता है, या संस्कारित करता है, यह वे ही जानते हैं. पिछले चार सालों से जिस तरह उनका संस्कार किया जा रहा है, अगर वह जारी रहा तो राहुल गांधी की चेतावनी हकीकत में बदल जाएगी. यानी भारत पूरी तरह बदल जाएगा.
ब्रदरहुड और संघ में समानता का एक आधार पश्चिम में पैदा हुए विचारों से उनकी घृणा है. ब्रदरहुड उसे मुसलमानों को भ्रष्ट करने वाला मानता है. संघ भी शुद्ध भारतीय चिंतन और संस्कृति पर जोर देता है. पश्चिम की टेकनोलॉजी से इन दोनों को कोई परेशानी नहीं क्योंकि वह इन शुद्ध विचारों को प्रसारित करने का माध्यम भर है.
राहुल गाँधी का यह आक्रामक और सीधा रुख संघ के लिए नया है. यह भी ध्यान दें कि आजतक किसी राजनेता ने संघ को सीधे चुनौती नहीं दी है. उसे किसी ने अभारतीय नहीं कहा है. किसी ने उसकी तुलना हिंसक संगठनों से नहीं की है.
इसीलिए वह राहुल के इस हमले से चौकन्ना हो गया है. भारतीय जनता पार्टी के विरोध या उसके नेताओं पर हमले से संघ को प्रायः कोई परेशानी नहीं रही है. लेकिन संघ की आलोचना से उसके कान खड़े हो जाते हैं.
इसका एक कारण यह है कि वह बहुत चर्चा में रहना शायद पसंद नहीं करता. उसका तरीका हर प्रकार के रडार के नीचे रह कर काम करने का है. अत्यधिक चर्चा से उसकी पड़ताल शुरू हो जाती है और उसकी रणनीतियों की बारीकी से जांच होने लगती है. संघ नहीं चाहता कि उसके सारे पक्ष प्रकाशित हों.
जवाहरलाल नेहरू के बाद राहुल पहले कांग्रेसी नेता हैं जो संघ को भारत के लिए सबसे बड़ा ख़तरा बता रहे हैं. बीच में जनता पार्टी के सरकार के वक्त संघ की सदस्यता को जॉर्ज फर्नांडीस और उनेक दूसरे समाजवादी साथियों ने अस्वीकार्य बताया था और इसी के चलते जनता पार्टी टूट गई थी.
जन संघ जिसने खुद जो जनता पार्टी में विलीन कर दिया था, अलग हो गया क्योंकि उसकी पहली और अंतिम प्रतिबद्धता संघ से थी. बाद में वही भारतीय जनता पार्टी के नाम से अवतरित हुआ.
नेहरू संघ को भारत के विचार के लिए ख़तरा मानते थे. इसलिए संघ और जन संघ दोनों से वे लोगों को सावधान करते रहे. कांग्रेस में जो एक हिंदू मन पहले से सक्रिय था, जिसके प्रतिनिधि राजेंद्र प्रसाद, गोविंद वल्लभ पंत, सरदार पटेल, पुरुषोत्तम दास टंडन, रवि शंकर शुक्ल जैसे लोग थे. इन्हें संघ से विशेष परेशानी न थी.
5 दिसंबर, 1947 को लखनऊ से एक ख़त में इंदिरा गांधी संघ के बढ़ते प्रभाव के नेहरू को सावधान करते हुए लिखती हैं. जिसमें संघ की एक रैली का वे विस्तार से वर्णन करती हैं. वे जर्मनी के 'ब्राउन शर्ट' की लोकप्रियता का जिक्र करके कहती हैं, "जर्मनी का हालिया इतिहास हमारे इतना क़रीब है कि एक क्षण के लिए भी उसे भूलना कठिन है. क्या हम भारत के लिए उसी भाग्य को न्योता दे रहे हैं?"
इसके बाद इंदिरा यह कहती हैं कि "कांग्रेस का संगठन पहले ही इसके कब्जे में आ चुका है. ज़्यादातर कांग्रेसी ऐसी प्रवृत्तियों का समर्थन करते हैं. वाही हाल हर ओहदे पर बैठे सरकारी अधिकारियों का है."

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